"कला और हुनर को जिले ने नकारा, संभाग ने पुचकारा, नर्मदापुरम के मूक-बधिर शाला संचालक की जिला स्तर पर उपेक्षा"
नर्मदापुरम।सूत्रों की आवाज
'चिराग तले अंधेरा' वाली कहावत इन दिनों नर्मदापुरम जिले के शिक्षा विभाग और सामाजिक न्याय विभाग पर सटीक बैठती दिख रही है। संभाग के एकमात्र प्रशिक्षित शिक्षक और मूक-बधिर बच्चों के भविष्य को संवारने वाले 'संकल्प मूक बधिर शाला' के प्रबंधक कपलेश कुरेले को जहाँ प्रादेशिक और राष्ट्रीय स्तर पर उनके हुनर के लिए सम्मान मिल रहा है, वहीं स्थानीय जिला प्रशासन की अनदेखी के चलते उनकी संस्था आज दम तोड़ने की कगार पर पहुँच गई है।
"राष्ट्रपति के मंच पर चमका नर्मदापुरम का हुनर"
बीती 18 जून को बैतूल में आयोजित एक गरिमामयी कार्यक्रम में भारत सरकार की माननीय राष्ट्रपति महोदया द्रौपदी मुर्मू शामिल हुई थीं। राष्ट्रपति के भाषण और उनके वाक्यों को कार्यक्रम में मौजूद श्रवण व मूक-बधिर छात्रों तक पहुँचाने की एक बेहद महत्वपूर्ण जिम्मेदारी नर्मदापुरम के कपलेश कुरेले को सौंपी गई थी।
कार्यालय उप संचालक, सामाजिक न्याय एवं दिव्यांगजन सशक्तिकरण (बैतूल) द्वारा उन्हें 'साइन लैंग्वेज इंटरप्रेटर' (सांकेतिक भाषा अनुवादक) का आधिकारिक दायित्व दिया गया। कपलेश जी ने मंच पर राष्ट्रपति के साथ-साथ राज्यपाल और केंद्रीय मंत्रियों के भाषणों का भी सफलतापूर्वक सांकेतिक भाषा में अनुवाद किया, जिसने पूरे नर्मदापुरम संभाग और जिले को गौरवान्वित किया है।
"संभाग में मिला सम्मान, जिले में मिली उपेक्षा"
खेद का विषय यह है कि जिस विशेष कला और मानवीय सेवा के कारण कपलेश कुरेले को राष्ट्रपति का मंच मिला और संभाग स्तरीय उच्च अधिकारियों ने उनके हुनर को तवज्जो दी, उसी हुनर को जिला स्तरीय अधिकारियों ने पूरी तरह नकार दिया है।
"दम तोड़ने की कगार पर विशेष संस्था"
> संकट का सामना कर रही 'संकल्प मूक बधिर शाला' पिछले 10 वर्षों से हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी स्थित मंगल भवन में संचालित हो रही थी। लेकिन स्थानीय नागरिकों द्वारा मंगल भवन की मांग किए जाने के बाद, इस विशेष शाला को कलेक्ट्रेट गेट (कोठी बाजार) के स्थानांतरित कर दिया गया। वर्तमान में यह स्कूल अत्यन्त दयनीय,बेहद खराब परिस्थितियों में चल रहा है।
"मान्यता नवीनीकरण न होना मुख्य वजह"
संस्था के बंद होने की कगार पर पहुँचने का सबसे बड़ा कारण जिले के शिक्षा विभाग और सामाजिक न्याय विभाग की घोर उपेक्षा है। लंबे समय से इस विशेष विद्यालय की मान्यता का नवीनीकरण अटका हुआ है, जिसके चलते शासकीय सहायता और व्यवस्थाएं ठप हैं।
वर्तमान में जिले की यह एकमात्र ऐसी संस्था है, जो मूक-बधिर छात्रों के लाचार अभिभावकों की उम्मीद और स्थानीय जागरूक नागरिकों के सहयोग से जैसे-तैसे चल रही है।
"जिला प्रशासन से शीघ्र संज्ञान की मांग"
राष्ट्रीय मंच पर जिले का नाम रोशन करने वाले शिक्षक और दिव्यांग बच्चों के इस एकमात्र सहारे को बचाने के लिए अब स्थानीय स्तर पर मांग उठने लगी है। प्रबुद्ध नागरिकों और अभिभावकों का कहना है कि जिला प्रशासन के आला अधिकारियों को इस गंभीर संवेदनशील मामले को तुरंत संज्ञान में लेना चाहिए। कागजी दावों से इतर, इन दिव्यांग बच्चों के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए जल्द से जल्द कोई ठोस और स्थायी कदम उठाया जाना बेहद जरूरी है।
