*'अंग्रेज गए, नियम रह गए': नर्मदापुरम में नजूल पट्टे के चक्रव्यूह में उलझे हजारों परिवार, 'फ्री-होल्ड' की मांग तेज*
*नर्मदापुरम।*
नर्मदा नदी के तट पर बसा प्राचीन और धार्मिक नगर नर्मदापुरम (पूर्व होशंगाबाद) इन दिनों एक ऐसे प्रशासनिक चक्रव्यूह में फंसा है, जो सीधे तौर पर शहर के हजारों परिवारों के 'आशियाने' के हक से जुड़ा है। ब्रिटिश शासनकाल के दौरान बनाए गए नजूल पट्टे (लीज) के नियम आज भी आधुनिक भारत में नागरिकों के लिए बड़ी मुसीबत बने हुए हैं।
*ब्रिटिश कालीन 'उपहार' बना आज का दर्द*
इतिहास पर नजर डालें तो आजादी के बाद ब्रिटिश अधिकारियों ने अपने कर्मचारियों और करीबियों को सेवा के बदले उपहार स्वरूप कुछ भूखंड मामूली भू-भाटक शुल्क पर 30 वर्षों की लीज पर दिए थे। समय के साथ ये पट्टे नवीनीकृत होते रहे। 1965 में तत्कालीन अधिकारियों ने इन्हें 1995 तक के लिए बढ़ाया। लेकिन जैसे-जैसे शहर का विस्तार हुआ और लोग महानगरों से यहाँ बसने आए, उन्होंने ये पट्टे खरीदकर मकान तो बना लिए, मगर सरकारी फाइलों में नाम चढ़ाने की प्रक्रिया इतनी जटिल रही कि कई लोग आज भी पट्टे के असली 'स्वामित्व' के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
*कछुआ चाल से चल रही प्रक्रिया, बुजुर्ग परेशान*
नियमों की जटिलता और जानकारी के अभाव में कई पट्टाधारियों ने समय रहते अपने पट्टे नवीनीकृत नहीं कराए। स्थानीय निवासियों का कहना है कि 31 मार्च 2025 को कई पट्टों की समय-सीमा समाप्त हो गई है, और जिन्होंने नवीनीकरण के लिए आवेदन किए हैं, उन्हें भी एक वर्ष से अधिक का समय बीत चुका है। नजूल कार्यालय के चक्कर काट-काटकर बुजुर्ग थक चुके हैं, लेकिन काम की गति 'कछुआ' जैसी है।
*अगली पीढ़ी के लिए भविष्य अनिश्चित*
इस समस्या का सबसे चिंताजनक पहलू भविष्य को लेकर है। जो बुजुर्ग आज सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं, उन्हें यह डर सता रहा है कि उनके बाद उनकी संतानें—जो विदेशों और बड़े महानगरों में स्थापित हैं—वे इस जटिल 'लालफीताशाही' का सामना कैसे करेंगी। क्या वे अपनी पुश्तैनी संपत्ति का मालिकाना हक खो देंगी?
*जनता की मांग: अब चाहिए 'फ्री-होल्ड'*
शहरवासियों और जागरूक नागरिकों का एक ही स्वर है—शासन को अब इस औपनिवेशिक व्यवस्था से मुक्ति दिलानी चाहिए। निवासियों की प्रमुख मांगें हैं:
*फ्री-होल्ड:* नजूल भूमि को एकमुश्त प्रीमियम लेकर 'फ्री-होल्ड' किया जाए ताकि नागरिकों को बार-बार नवीनीकरण के झंझट से मुक्ति मिले।
*सरलीकरण:* यदि फ्री-होल्ड संभव न हो, तो वर्तमान पट्टा नवीनीकरण प्रक्रिया को पूर्णतः ऑनलाइन और पारदर्शी बनाया जाए।
*भू-स्वामित्व योजना:* ग्रामीण क्षेत्रों की तर्ज पर शहरी आबादी के लिए भी स्पष्ट 'भू-स्वामित्व' कार्ड की नीति लागू हो।
प्रशासनिक स्तर पर यदि इस समस्या का शीघ्र निदान नहीं किया गया, तो नर्मदापुरम के हजारों परिवारों का अपनी ही संपत्ति पर मालिकाना हक का सपना संकट में पड़ सकता है। शासन को अब 'ईज ऑफ लिविंग' (Ease of Living) की दिशा में ठोस कदम उठाने की जरूरत है।
