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पिपरिया की ऐतिहासिक भूमि व मंदिर पर फर्जी न्यास का दावा, राजघराने ने जताया विरोध

 


पिपरिया की ऐतिहासिक भूमि व मंदिर पर फर्जी न्यास का दावा, राजघराने ने जताया विरोध


नर्मदापुरम् 6/1/2026  (छगन कुशवाहा पिपरिया) नर्मदापुरम् पिपरिया,शोभापुर–पिपरिया क्षेत्र की ऐतिहासिक राजस्व भूमि और प्राचीन श्री ठाकुर जी मंदिर को लेकर बड़ा विवाद सामने आया है। शोभापुर राजघराने के वर्तमान वंशज राजा विक्रम बहादुर शाह ने आरोप लगाया है कि उनकी पैतृक भूमि पर स्थित मंदिर पर तथाकथित लोक न्यास के नाम पर अवैध कब्जा और फर्जी तरीके से नजूल पट्टा नवीनीकरण कराया गया है।

राजा विक्रम बहादुर शाह के अनुसार, मुगल साम्राज्य की स्थापना से पूर्व यह क्षेत्र हिंदू सम्राटों के छोटे-छोटे गणराज्यों का हिस्सा रहा है। 16वीं सदी में यह इलाका गोंडवाना राज्य के अंतर्गत था, जहां रानी दुर्गावती का शासन रहा। शोभापुर और फतेहपुर राजघराने गोंड राजाओं के अधीन रहे, जिनका इतिहास राजा भीमराव से जुड़ा हुआ है। वर्तमान में शोभापुर के राजा विक्रम बहादुर शाह 34वीं पीढ़ी के वंशज हैं।

उन्होंने बताया कि 84 गांवों की मौजा में राजा उमराव शाह का नाम आज भी शासकीय राजस्व अभिलेखों में भूमि स्वामी के रूप में दर्ज है। वर्ष 1915 के खसरा रिकॉर्ड में मौजा पिपरिया स्थित खसरा नंबर 188, रकबा 1.42 एकड़ भूमि राजा उमराव शाह नंबरदार के नाम पर दर्ज है। इसी भूमि पर राजघराने द्वारा अपने कुल गुरुओं की साधना हेतु श्री ठाकुर जी का मंदिर बनवाया गया था, जहां वर्षों से माधवदास महाराज, बाबा परसरामदास, भरतदास, नारायणदास और रामदास की परंपरा में पूजा-अर्चना होती रही है। 1963 तक यह भूमि निर्विवाद रूप से राजघराने के नाम दर्ज रही।

राजा विक्रम बहादुर शाह का आरोप है कि वर्ष 1955 में गोपालदास नामक व्यक्ति ने किसी अन्य स्थान के लोक न्यास का आधार लेकर मंदिर और भूमि पर दावा करना शुरू किया। उसने बिना किसी स्वत्व दस्तावेज के भूमि को तथाकथित ‘देवराम जानकी मंदिर लोक न्यास’ की संपत्ति बताकर नजूल पट्टा प्राप्त करने का प्रयास किया, लेकिन कोई वैध दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सका। बाद में उसके उत्तराधिकारी सुखरामदास भी स्वामित्व से जुड़े कागजात प्रस्तुत नहीं कर पाए, जिसके चलते नजूल पट्टा जारी नहीं हुआ।

विवाद ने नया मोड़ तब लिया जब वर्ष 2015 में यंगेश्वरदास नामक व्यक्ति ने पट्टा नवीनीकरण के लिए आवेदन किया। आरोप है कि उसने गलत जानकारी देकर यह दर्शाया कि पूर्व में पट्टा प्राप्त है और उसी आधार पर शपथ पत्र देकर 30 वर्षों के लिए नजूल पट्टा नवीनीकरण करा लिया। जबकि इस प्रक्रिया में न तो पूर्व पट्टा प्रस्तुत किया गया, न ही स्वत्व संबंधी दस्तावेज और न ही नागरिकों द्वारा दी गई आपत्तियों का निराकरण किया गया। यह मामला वर्तमान में नजूल अधिकारी के समक्ष जांचाधीन है।

राजा विक्रम बहादुर शाह ने स्पष्ट किया कि यंगेश्वरदास न तो राजघराने द्वारा नियुक्त पुजारी है और न ही श्री ठाकुर जी मंदिर (वर्तमान नाम देवराम जानकी मंदिर) का अधिकृत प्रतिनिधि। उन्होंने मंदिर में गंभीर अनियमितताओं के आरोप भी लगाए हैं। उनका कहना है कि मंदिर को साधना और पूजा के स्थान पर व्यवसायिक केंद्र बना दिया गया है, धार्मिक आयोजन और साधु-संतों की सेवा बंद कर दी गई है तथा मंदिर की आय का निजी उपयोग किया जा रहा है।

इसके अलावा मंदिर के गर्भगृह से छेड़छाड़ कर मूल मूर्तियों को हटाने, भगवान को दूसरी मंजिल पर स्थापित करने और पुराने गर्भगृह को गोदाम में बदलने जैसे गंभीर आरोप भी लगाए गए हैं। अनधिकृत दुकानों से किराया वसूली और लगातार विवादों के कारण मंदिर की छवि धूमिल हो रही है, जिसको लेकर आपराधिक प्रकरण भी दर्ज बताए जा रहे हैं।

राजघराने ने प्रशासन से पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर ऐतिहासिक भूमि और मंदिर की पवित्रता को सुरक्षित रखने की मांग की है।


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