पिपरिया में यज्ञोपवीत संस्कार सम्पन्न, 60 बालकों के लगभग ने धारण किया जनेऊ
नर्मदापुरम् 28/1/206(छगन कुशवाहा पिपरिया) नर्मदापुरम्
पिपरिया,श्रीरामचरितमानस यज्ञ समिति, पिपरिया के तत्वावधान में बुधवार 28 जनवरी को सामूहिक यज्ञोपवीत (उपनयन) संस्कार का भव्य आयोजन किया गया। कार्यक्रम में नगर एवं आसपास के क्षेत्रों से आए लगभग 60 बालकों ने विधिविधान से जनेऊ संस्कार संपन्न कराया।
संस्कार का संचालन यज्ञाचार्य द्वारा वैदिक मंत्रोच्चार एवं शास्त्रोक्त विधि से किया गया। समिति अध्यक्ष श्याम सुंदर सोनी ने बताया कि यज्ञोपवीत संस्कार हिंदू धर्म के 16 संस्कारों में दसवां महत्वपूर्ण संस्कार है, जिसे बालक के बौद्धिक एवं आध्यात्मिक जन्म का प्रतीक माना जाता है। इस संस्कार के पश्चात बालक को द्विज अर्थात दूसरा जन्म प्राप्त करने वाला कहा जाता है।
संस्कार का आध्यात्मिक महत्व
यज्ञोपवीत में तीन सूत्र होते हैं, जो देव ऋण, पितृ ऋण और ऋषि ऋण के प्रतीक माने जाते हैं। ये तीनों सूत्र ब्रह्मा-विष्णु-महेश अथवा महाकाली-महालक्ष्मी-महासरस्वती का भी प्रतिनिधित्व करते हैं। प्राचीन काल में यह संस्कार बालक के गुरुकुल प्रवेश एवं वेद अध्ययन के आरंभ का सूचक था।
शास्त्रों के अनुसार ब्राह्मण बालक के लिए 8 वर्ष, क्षत्रिय के लिए 11 अथवा 12 वर्ष तथा वैश्य बालक के लिए 12 वर्ष की आयु में यह संस्कार करने का विधान है।
प्रमुख विधि-विधान
संस्कार की शुरुआत बालकों के मुंडन एवं पवित्र स्नान से हुई। इसके पश्चात गुरु अथवा पिता द्वारा गायत्री मंत्र की दीक्षा दी गई। जनेऊ धारण के समय वैदिक मंत्रों का उच्चारण किया गया—
“ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेयर्त्सहजं पुरस्तात्।
आयुष्यमग्र्यं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः॥”
संस्कार में जनेऊ की पवित्रता बनाए रखने हेतु स्वच्छता संबंधी नियमों की भी जानकारी दी गई।
धार्मिक के साथ वैज्ञानिक दृष्टिकोण
विद्वानों ने बताया कि जनेऊ हृदय के पास से होकर गुजरता है, जिससे रक्त संचार संतुलित रहने में सहायता मिलती है। वहीं मल-मूत्र विसर्जन के समय जनेऊ को दाहिने कान पर लपेटने की परंपरा को एक्यूप्रेशर से जोड़कर देखा जाता है, जो स्मरण शक्ति एवं पाचन तंत्र पर सकारात्मक प्रभाव डालती है।
कार्यक्रम में अभिभावकों, धर्मप्रेमी नागरिकों एवं समिति सदस्यों की उल्लेखनीय उपस्थिति रही। वातावरण वेद मंत्रों, आस्था और संस्कारों से ओत-प्रोत रहा।





