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करोड़ों के राजस्व को चपत: 10 साल से 'ग्रहण' का शिकार" नगरपालिका का कमर्शियल कॉम्प्लेक्स, असामाजिक तत्वों का बना अड्डा

 "करोड़ों के राजस्व को चपत: 10 साल से 'ग्रहण' का शिकार" नगरपालिका का कमर्शियल कॉम्प्लेक्स, असामाजिक तत्वों का बना अड्डा



" ₹16 लाख की लागत से बनीं 18 दुकानें, एक-एक दुकान 20-20 लाख में हुई थी नीलाम:- जनप्रतिनिधियों की 'अप्रत्यक्ष हिस्सेदारी' के चलते अटकी कार्रवाई, बेरोजगार युवा पर

नगर के मध्य और सबसे व्यस्ततम मुख्य व्यापारिक क्षेत्र गुप्ता ग्राउंड,टेक्सी स्टैंड के पास स्थित नगरपालिका का भव्य व्यावसायिक परिसर अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। शासन की जनहित और जनकल्याण की मंशा को ठेंगा दिखाते हुए यह कमर्शियल कॉम्प्लेक्स पिछले 10 वर्षों से सफेद हाथी साबित हो रहा है। जहाँ एक तरफ स्थानीय बेरोजगार युवा रोजगार के लिए बाजार में दर-दर भटक रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ नगरपालिका प्रशासन की घोर लापरवाही और कड़े फैसलों के अभाव में शासन को हर महीने लाखों रुपये के राजस्व की चपत लग रही है।

"नोटबंदी से लेकर कोरोना तक की मार, अब इच्छाशक्ति का अभाव"

जानकारी के अनुसार, पूर्व नगरपालिका परिषद के कार्यकाल में लगभग ₹16 लाख की लागत से इस परिसर में 18 दुकानों का निर्माण कराया गया था। निर्माण के बाद इन्हें खुली बोली और नीलामी के माध्यम से आवंटित भी कर दिया गया था। एक-एक दुकान की बोली ₹20-20 लाख तक लगी, जिससे नगरपालिका को भारी आय सुनिश्चित हुई। लेकिन इस कॉम्प्लेक्स के शुरुआती दौर में ही ऐसा ग्रहण लगा कि आज तक दुकानों के शटर नहीं उठ सके। पहले नोटबंदी, फिर कोरोना लॉकडाउन और बाद में न्यायालयीन प्रकरणों के चलते दुकानों का आधिपत्य (पजेशन) लंबे समय तक लंबित रहा।

"वर्तमान परिषद भी मौन, कुछ ही समय का कार्यकाल शेष"

विडंबना यह है कि व्यापारीयो ने परीसर में एक ही सीढ़ी होने की शिकायत कर उच्च न्यायालय से स्थगन लिया था लेकिन नगरपालिका परिषद ने एक अन्य  वैकल्पिक सीढ़ी बना कर न्यायालय को जवाब दे कर स्थगन से मुक्त हो गई, न्यायालयीन बाधाएं दूर होने के बाद भी वर्तमान नगरपालिका परिषद के कार्यकाल में इस दिशा में कोई गति दिखाई नहीं दे रही है। अब इस परिषद का भी कुछ ही समय शेष रह गया है। आलम यह है कि व्यस्ततम बाजार के बीच बना यह करोड़ों का परिसर अब भिखारियों, नशाखोरों और असामाजिक तत्वों का सुरक्षित अड्डा बन चुका है, जिससे आसपास के व्यापारियों और आम जनता में भारी आक्रोश है। स्थानीय नागरिकों को अब अगली परिषद से ही कुछ उम्मीदें दिखाई दे रही हैं।

 "जनप्रतिनिधियों की 'हिस्सेदारी' के कारण राजस्व वसूली ठप!"

नगरपालिका के ही सूत्रों से मिली चौंकाने वाली जानकारी के अनुसार, इस पूरे मामले में ठंडे रवैये का मुख्य कारण राजनीतिक सांठगांठ है। बताया जा रहा है कि नगरपालिका परिषद से जुड़े कुछ रसूखदार जनप्रतिनिधियों की इन दुकानों में अप्रत्यक्ष रूप से हिस्सेदारी है। यही वजह है कि नगरपालिका प्रशासन इन आवंटित दुकानदारों पर दुकानें खोलने या राजस्व वसूलने का दबाव नहीं बना पा रहा है।

 'दुकानें बंद तो भी देना होगा किराया'— कड़े नियमों की दरकार

व्यापारिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस गतिरोध को तोड़ने के लिए नगरपालिका को तत्काल सख्त कदम उठाने होंगे। आवंटित दुकानदारों को अंतिम नोटिस देकर 30 दिनों के भीतर दुकानें खोलने का आदेश दिया जाना चाहिए। इसके साथ ही 

"दुकानें खुलें या बंद रहें, आधिपत्य सौंपने के दिन से मासिक किराया अनिवार्य रूप से वसूला जाए" का नियम लागू होना चाहिए। जब दुकानदारों पर हर महीने किराया देने की बाध्यता होगी, तो उनका आलस्य स्वतः ही समाप्त हो जाएगा और नगरपालिका को अतिरिक्त राजस्व की प्राप्ति होगी।

"3 दुकानों की नीलामी अभी भी शेष:-

 कुल 18 दुकानों में से 3 दुकानें अभी भी शेष हैं, जिन्हें खुली बोली नीलामी के माध्यम से दिया जाना है। यदि नगरीय प्रशासन विभाग इस मामले में हस्तक्षेप कर मूलभूत सुविधाएं (बिजली, पानी, सुरक्षा) बहाल कराए और बची हुई दुकानों की पारदर्शी नीलामी करे, तो युवाओं को रोजगार के नए अवसर मिलेंगे

" नगरीय प्रशासन विभाग से सख्त कार्रवाई की मांग"

स्थानीय बेरोजगार युवाओं और सजग नागरिकों ने नगरीय प्रशासन विभाग के उच्च अधिकारियों से मांग की है कि इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच कराई जाए। जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों की मिलीभगत को उजागर कर, जनहित में इस व्यावसायिक परिसर को तुरंत चालू कराया जाए ताकि नगर के विकास और युवाओं के रोजगार का सपना साकार हो सके।

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