तुलसी नगर में ज्ञान यज्ञ: दीनता, वर्ण व्यवस्था और रामचरित मानस पर संतों के सारगर्भित प्रवचन
नर्मदापुरम् 26/1/206(छगन कुशवाहा पिपरिया) नर्मदापुरम्
पिपरिया, तुलसी नगर में चल रहे श्रीरामचरित मानस यज्ञ एवं नवन्हान परायण कार्यक्रम के अंतर्गत आयोजित ज्ञान यज्ञ में संतों और विद्वानों के ओजस्वी प्रवचनों से पूरा क्षेत्र धर्ममय वातावरण से सराबोर हो गया है। सुबह से ही बड़ी संख्या में श्रद्धालु यज्ञ मंडप की परिक्रमा, रामायण पाठ एवं प्रवचन श्रवण हेतु पहुंच रहे हैं।
ज्ञान यज्ञ में प्रवचन देते हुए हिगन घाट निवासी श्री सुरेशचंद जी महाराज ने दीनता की बहुआयामी व्याख्या प्रस्तुत की। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति ईश्वर की लय को प्राप्त कर ले, वही वास्तव में दीन कहलाता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भगवान को दीन क्यों प्रिय हैं, इसका रहस्य आत्मसमर्पण और अहंकार-त्याग में निहित है।
वहीं जगतगुरु लक्ष्मणाचार्य जी ने जाति एवं वर्ण व्यवस्था पर सारगर्भित प्रहार करते हुए कुरूक्षेत्र सूत्र के श्लोक की व्याख्या की। उन्होंने चारों वर्णों को मानव शरीर से जोड़ते हुए बताया कि पैरों को शूद्र, पेट को वैश्य, भुजाओं को क्षत्रिय और सिर को ब्राह्मण का प्रतीक माना गया है। उन्होंने कहा कि शरीर के अन्य अंगों की क्षति के बाद भी जीवन संभव है, लेकिन सिर नष्ट होते ही जीवन समाप्त हो जाता है, इसलिए ज्ञान और विवेक सर्वोपरि हैं।
कार्यक्रम में सुश्री शांति सिरिया ने कहा कि यदि जीवन में श्रीरामचरित मानस की केवल एक चौपाई भी आत्मसात कर ली जाए, तो जीवन धन्य हो सकता है। वहीं प्रयागराज से पधारे युवा कथाकार शिवम शुक्ला ने प्रभु अनुग्रह को सौभाग्य प्राप्ति का आधार बताते हुए भावपूर्ण उदाहरणों के माध्यम से श्रोताओं को भावविभोर कर दिया।
नगर में चल रहे इस भव्य रामचरित मानस यज्ञ एवं ज्ञान यज्ञ के दौरान बाहर से आए विद्वान वक्ताओं के प्रवचन लगातार श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक ऊर्जा प्रदान कर रहे हैं। पूरा क्षेत्र धर्ममय आवरण से ढका हुआ है और वातावरण में सकारात्मकता का संचार हो रहा है। यह धार्मिक क्रम निरंतर जारी है।





