माँ नर्मदा का सांडिया घाट: ऋषि शांडिल्य से जुड़ी है पौराणिक कथा
नर्मदापुरम् 24/1/206(छगन कुशवाहा पिपरिया) नर्मदापुरम्प पिपरिया, माँ नर्मदा के पावन तट पर स्थित सांडिया घाट केवल एक धार्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि एक गहन पौराणिक कथा का साक्षी भी है। मान्यता है कि इसी स्थान से शांडिल्य ऋषि का नाम जुड़ने के कारण यह तीर्थ कालांतर में शांडिल्येश्वर और फिर अपभ्रंश होकर सांडिया घाट कहलाया।
पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार महर्षि जमदग्नि, वसिष्ठ, याज्ञवल्क्य सहित अनेक ऋषियों ने मिलकर एक विशाल यज्ञ करने का संकल्प लिया। सभी ऋषियों को आमंत्रित किया गया, लेकिन श्रेष्ठ ऋषि महर्षि कश्यप यज्ञ में नहीं पहुंच सके। उनके बिना यज्ञ अपूर्ण मानकर ऋषियों ने कुशा की ग्रंथि बनाकर उसमें कश्यप ऋषि का आवाहन कर पूजन आरंभ किया।
इसी दौरान दैवयोग से महर्षि कश्यप स्वयं यज्ञ स्थल पर उपस्थित हो गए। कुशा ग्रंथि का पूजन होते देख उन्होंने कारण पूछा। ऋषियों ने बताया कि उनके न आने के कारण प्रतीक रूप में यह कुशा ग्रंथि बनाई गई थी। यह सुनकर कश्यप ऋषि प्रसन्न हुए और बोले कि ऋषियों का संकल्प व्यर्थ नहीं जाएगा।
इसके बाद कश्यप ऋषि ने अपने कमंडलु से मंत्रोच्चार के साथ जल छिड़का। देखते ही देखते कुशा ग्रंथि से एक जटाधारी, वल्कल वस्त्र धारण किए, मृगचर्म ओढ़े महर्षि प्रकट हुए। महर्षि कश्यप ने उनका नाम शांडिल्य ऋषि रखा।
उस समय वहां उपस्थित महर्षि उपमन्यु ने अपनी पुत्री शांडिला का विवाह शांडिल्य ऋषि से कर दिया। विवाह के बाद शांडिल्य ऋषि एवं शांडिला देवी ने नर्मदा तट पर इसी स्थान पर दीर्घकाल तक तपस्या की और अपने नाम से शांडिल्येश्वर शिवलिंग की स्थापना की।
तभी से यह स्थल शांडिल्येश्वर तीर्थ के नाम से प्रसिद्ध हुआ, जो आगे चलकर सांडिया घाट कहलाया। धार्मिक मान्यता है कि यहां जप-तप, यज्ञ-याग, ब्रह्मभोज और गायत्री पुरश्चरण का विशेष महत्व है। प्राचीन काल में अनेक ऋषियों द्वारा यहां यज्ञ संपन्न किए गए।
आज भी सांडिया घाट श्रद्धालुओं के लिए आस्था, तप और पौराणिक गौरव का प्रमुख केंद्र बना हुआ है, जहां नर्मदा मैया की अविरल धारा के साथ इतिहास और धर्म का संगम देखने को मिलता है।
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